(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.87. अध्यायः 087
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
धौम्येन युधिष्ठिरंप्रति प्रतीचीस्थतीर्थकथनम् ॥ 1 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

धौम्य उवाच। 3-87-0x(1996)(19660)
अवन्तीषु प्रतीच्यां वै कीर्तयिष्यामि ते दिशि।
यानि तत्रपवित्राणि पुण्यान्यायतनानि च ॥ 3-87-1(19661)
प्रियङ्ग्वाम्रवणोपेता वानीरफलमालिनी।
प्रत्यक्स्रोता नदी पुण्या नर्मदा तत्र भारत ॥ 3-87-2(19662)
त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।
सरिद्वनानि शैलेन्द्रा देवाश्च सपितामहाः ॥ 3-87-3(19663)
नर्मदायां कुरुश्रेष्ठ सहसिद्धर्षिचारणैः।
स्नातुमायान्ति पुण्यौधैः सदा वारिषु भारत ॥ 3-87-4(19664)
निरेतः श्रूयते पुण्यो यत्र विश्रवसो मुनेः।
जज्ञे धनपतिर्यत्र कुबेरो नरवाहनः ॥ 3-87-5(19665)
वैढूर्यशिखरो नाम पुण्यो गिरिवरः शिवः।
नित्यपुष्पफलास्तत्र पादपा हरितच्छदाः ॥ 3-87-6(19666)
तस्य शैलस्य शिखरे सरः पुण्यं महीपते।
फुल्लपद्मं महाराज देवगन्धर्वसेवितम् ॥ 3-87-7(19667)
बह्वाश्चर्यं महाराज दृश्यते तत्र पर्वते।
पुण्ये स्वर्गोपमे चैव देवर्षिगणसेविते ॥ 3-87-8(19668)
ह्रदिनी पुण्यतीर्था च राजर्षेस्तत्र वै सरित्।
विश्चामित्रेण तपसा निर्मिता सर्वपावनी ॥ 3-87-9(19669)
यस्यास्तीरे सतां मध्ये ययातिर्नहुषात्मजः।
पपात स पुनर्लोकाँल्लेभे धर्मान्सनातनान् ॥ 3-87-10(19670)
तत्रपुण्यो ह्रदः ख्यातो मैनाकश्चैव पर्वतः।
बहुमूलफलोपेतस्त्वमितो नाम पर्वतः ॥ 3-87-11(19671)
आश्रमः कक्षसेनस्य पुण्यस्तत्रयुधिष्ठिरः।
च्यवनस्याश्रमश्चैव विख्यातस्तत्रपाण्डव।
तत्राल्पेनैव सिद्ध्यन्ति मानवास्तपसा विभो ॥ 3-87-12(19672)
जम्बूमार्गो महाराज ऋषीणां भावितात्मनाम्।
आश्रम शाम्यतां श्रेष्ठ मृगद्विजनिषेवितः ॥ 3-87-13(19673)
ततः पुण्यतमा राजन्सततं तापसैर्युता।
केतुमाला च मेध्या च गङ्गाद्वारं च भूमिप।
ख्यातं च सैन्धवारण्यं पुण्यं द्विजनिषेवितम् ॥ 3-87-14(19674)
पितामहसरः पुण्यं पुष्करं नाम नामतः।
वैखानसानां सिद्धानामृषीणामाश्रमः प्रियः ॥ 3-87-15(19675)
अप्यत्र संश्रयार्थाय प्रजापतिरथो जगौ।
पुष्करेषु कुरुश्रेष्ठ गाथां सुकृतिनांवर ॥ 3-87-16(19676)
मनसाऽप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनखिनः।
विप्रणश्यन्ति पापानि नाकपृष्ठे च मोदते ॥ 3-87-17(19677)

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणइ सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-87-2 प्रत्यक्स्त्रोता- पश्चिमवाहिनी ॥ 3-87-13 शाम्यतां शमवताम् ॥ 3-87-14 गङ्गारण्यं च भूमिपेति ध. पाठः ॥ 3-87-16 संश्रयार्थाय वासार्थम् ॥ 3-87-17 अभिकामस्य गन्तुमिच्छोः ॥


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